सरकार का “तर्क” कोई “चेतावनी” तो नहीं?
तेल में लगी
आग,आसमान छूती तेल की कीमतें,अबतक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचे पैट्रोल और डीज़ल
के दाम कुछ इसी तरह की लाइनें आपको टीवी,अखबार और वेबसाइट में देखने को मिल रही
होंगी। पेट्रोल पंप की मशीनों में लगे प्राइज़ मीटर की रोज़ बढ़ती रिडिंग भी ये ही
बताती है कि आज आपकी जेब पर और ज़्यादा बोझ बढ़ेगा।
इतना ही नहीं
अब तो सरकार ने भी इसपर हाथ खड़े कर लिए हैं। हाल ही में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ये कहते हुए
कि सरकार के हाथ में कुछ नही है, इसके पीछे कुछ मुख्य कारण बताए जिसमें से एक कारण
है अमरीका की तरफ से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध। क्योंकि सऊदी अरब, इराक़, नाइजीरिया और
वेनेज़ुएला के आलावा भारत में क़रीब 12% कच्चा तेल सीधे ईरान से आता है और ये बात
भी सही है कि ईरान पर लगाए गए अमरिकी प्रतिबंधों के बाद से भारत पर अमरीका का दबाव
है कि वो ईरान से तेल आयात बंद कर दे।
तो अगर सरकार के इस तर्क के हिसाब से
देखा जाए तो क्या आने वाले समय में भारत में कच्चे तेल की और भी कमी हो सकती है?
जिसके चलते दाम और भी बढ़ सकते हैं?
इसके लिए थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा।
दरअसल इसी साल अमरीका ने ईरान पर
दोबारा प्रतिबंध लगाने का फैसला करते हुए एक फरमान जारी किया जिसमें उसने कहा था
कि भारत, चीन
और पाकिस्तान समेत एशिया के देश ईरान से तेल आयात बंद कर दें।
वहीं अमरीका ने ईरान पर दो चरणों में
इस प्रतिबंध को लागू किया है जिसका पहला चरण 6 अगस्त से शुरु हो गया था और सरकार के अनुसार ये प्रतिबंध एक बड़ा कारण है देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ने का, इसी के चलते ये भी
खबरें आई थी कि सरकारी तेल कंपनियों ने जुलाई में ईरान से तेल की ज़बरदस्त
ख़रीदारी की। अब सवाल ये उठता है कि अगर प्रतिबंध का पहला चरण लागू होने से पहले
भारी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद के बाद भी तेल की कीमतों में आग लगी है तो जब
इस प्रतिबंध का दूसरा चरण जो कि 4
नवंबर से शुरु होने वाला है तब क्या हाल होगा ?
प्रतिबंध के पहले चरण में भारत और ईरान
के बीच में जो रुपया-रियाल समझौता था वो खत्म होता है, जिसके
तहत हम अपना भुगतान रुपयों में कर सकते थे। वहीं दूसरे चरण यानी 4 नवंबर के बाद से कच्चे तेल को लाने-ले जाने वाले अमरीकी
टैंकरों का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद हो जाएगा।
हालांकि भारत
भी अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहा है कि अमरीका से उसे कुछ रियायत मिल जाए मगर अभी
तक ऐसा कुछ भी होता दिख नहीं रहा है। पिछले दिनों भारत और अमरीका की 2+2 नाम की एक
बड़ी बैठक हुई। जिसके लिए अमरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और अमरिकी
रक्षामंत्री जेम्स मैटिस भारत आए मगर बैठक में इस मुद्दे पर कोई परिणाम नहीं
निकला।
अब अगर सरकार के बताए गए कारण पर ग़ौर किया जाए तो क्या नवंबर
के बाद से देश को पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों की और ज़्यादा मार झेलनी पड़ेगी ?
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