हमारा संकल्प-पारदर्शी सरकार, जवाबदेह सरकार?
जब देश लोकसभा चुनाव की तैयारी में लग रहा था...जब हर एक नेता अपनी
पार्टी और खुद को जनता का सेवक बता रहा था...उन सब के बीच में एक नेता जो इन सब की
तरह ही अपनी पार्टी या यूं कहें कि खुद को लेकर चुनाव की तैयारी कर
जनता के बीच में खूब छाया हुआ था...जिसके प्रभाव को नाम दिया गया “लहर”...मोदी की लहर...वो
लहर जिसमें झाड़,पत्ते सब पार लग गए...और जीत गए...इस लेख का
जो शीर्षक है उसमें मेरा कुछ भी नहीं है बस इस ‘?’
चिन्ह के अलावा वो
इसलिए कि ऊपर की पूरी लाइन जो कि “हमारा संकल्प-पारदर्शी सरकार,
जवाबदेह
सरकार” है वो भाजपा के
घोषणापत्र से चेपी है जो की 2014 लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र के आखिर में छपी थी।
अब थोड़ा 3 साल पीछे चलते है याद कीजिए चुनावों की सरगर्मी अपने चरम पर थी और उस
समय भाजपा या यूं कहें कि मोदी जी ने जो अपनी हर रैली में डगमगाती
अर्थव्यवस्था,भ्रष्टाचार,विकास और ना जानें बहुत मुद्दो पर लोगो का दिल के साथ-साथ
चुनाव भी जीत लिया था...देखा जाए तो घोषणापत्र को किसी भी पार्टी के वादों की
पोटली कहना ग़लत नहीं होगा क्योंकी उसमें जो लिखा होता है वो पार्टी के वो वादे
होते है जो वह जनता के वोट के बदले पूरे करने का दावा करती है...और भाजपा के घोषणापत्र
के हिसाब से तो भाजपा ने पारदर्शी और जवाबदेह सरकार का वादा नहीं बल्की संकल्प
लिया था...
तो संकल्प के हिसाब से पहले बात करते है
पारदर्शिता की...पारदर्शिता तो चुनाव जीतने के बाद से ही सवालों में आ गई जिसका
उदाहरण प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में पत्रकारों को ले जाने पर रोक...सबसे
ज्यादा पारदर्शिता अगर खत्म हुई तो वो थी नोटबंदी के समय आज तक किसी को नहीं पता
कि नोटबंदी क्यों? किस
तरह? और किस की सलाह
पर हुई? नोटबंदी के
क्या मायने थे? और
तो और सही मायने नोटबंदी से कौन ज्यादा और कौन कम प्रभावित हुआ यह तक नहीं पता लग
पा रहा है...एक नया और ताजा उदाहरण है कि पीएमओ ने एक RTI
के जवाब में कहा कि प्रधानमंत्री के दौरे से हुए लाभ का रिकॉर्ड
हमारे पास नहीं है और न ही यह आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा है...
सरकार की जवाबदेही पर भी नज़र डालते है पहला तो
सरकार के बनने के बाद से अब तक देश के प्रधानमंत्री ने एक भी प्रेस वार्ता नहीं
की...मीडिया से प्रधानमंत्री जी सिर्फ दिवाली मिलन समारोह या कहें कि सेल्फी
समारोह में ही मिलते है...वो बात अलग है कि किसी एक दो प्रतिष्ठित चैनलों को पूरा
इंटरवयू दे दिया तो दे दिया वर्ना ट्वीट और मन की बात बहुत है...मजेदारी तब है कि
अगर आपने ग़लती से भी सरकार से कोई सवाल पूछ लिया तो बस सरकार तक तो बात पहुंचेगी
ही नहीं आपको बाहर ही देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है और वो भी डायलॉग के साथ कि “पिछली साठ साल पुरानी सरकार से तो कभी
सवाल नहीं पूछे,वो कितना बिगाड़ गए है कुछ पता है? जो रायता वो फैला कर गए है उसे बटोरने में तो समय लगेगा ही” बस फिर ऐसा लगता है कि सवाल पूछ कर ही
रायता फैला दिया है...
इन सब में मीडिया ने भी जनता का भरोसा खो दिया
है क्योंकी मीडिया जनता का नेतृत्व करने के लिए होती है न की सरकार का नेतृत्व...और
दूसरा यह कि जनता तो तब कुछ जान पाएगी जब मीडिया सही जानकारी देगा...इसलिए मीडिया
और जनता के आपस का जो एक नाता था वो ही टूटता जा रहा...जिसका सीधा फायदा नेता और
उनकी पार्टियां ले जाती हैं...और सरकारें अपने वादे और संकल्प को भी ऐसी ही किसी
लहर में बहा देती है...
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