जाति कभी न जाती...
1 जनवरी की भीमा कोरेगांव लड़ाई...चाहे सन् 1818 की हो या फिर 2018 की...लड़ाई तब भी जात-पात की थी और आज भी जात-पात की है... शुरुआत करते हैं इतिहास से जब निचली जाति के लोगों का नगर में प्रवेश करना किसी चुनौती से कम नहीं था...सोचिए कि आप को कहा जाए कि जब आप इलाके में घुसे तो आपकी पीठ पर एक झाड़ू लटकी हो जो धरती को छूए जिससे आपके पैर जहां भी पड़े उस झाड़ू से वो हिस्सा साफ होता चले....आप पैर में चप्पल-जूते कुछ नहीं पहन सकते...आपको पानी के लिए अपना कुआ अलग खोदना होगा...आपके मुंह से निकला धूक कहीं ज़मीन को अपवित्र न कर दे इसलिए आप एक मटका अपने गले में डाल कर चले और उसमें ही आप धूकें...यह था हमारे यहां अछूत कहे जाने वाले लोगों का हाल.... महाराष्ट्र में हुए हाल के दंगों का करण भी जातीय मतभेद ही है...अब से 200 साल पहले जब ब्राह्मणों ने दलितों पर ये छुआछूत का फरमान जारी किया तो उन लोगों ने इसका विरोध किया लेकिन ऊंची जाति ( ब्राह्मणों ) वालों के न मानने पर दलित कहे जाने वाली महार जाती के लोगों ने अंग्रेजों का दामन थाम लिया...अंग्रेजों को तो बैठे बिठाए हथियार मिल गया था...और अंग्रेजों न...